Dear Sister I have a gift of God for your supreme welfare:
क्या आप जानते हैं कि भगवान स्वयं किन लोगों को मायावी राक्षस कहते हैं?
श्लोक : 9.12:
*मोगाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥*
संक्षेप :
जो लोग भगवान के दिव्य स्वरूप को नहीं पहचानते, वे भ्रमित रहते हैं। उनकी आशाएँ व्यर्थ होती हैं, कर्म निष्फल हो जाते हैं, और ज्ञान भी निरर्थक हो जाता है। वे आसुरी और राक्षसी प्रवृत्तियों की मोहिनी प्रकृति में फँसे रहते हैं।
व्याख्या :
इस श्लोक में भगवान उन लोगों की स्थिति बताते हैं जो आध्यात्मिक सत्य से विमुख हैं। ऐसे लोग धर्म के बाह्य रूपों में उलझे रहते हैं, परंतु भगवान के सच्चे स्वरूप को नहीं समझते। उनकी आशाएँ केवल सांसारिक सुखों तक सीमित होती हैं, इसलिए वे कभी संतोष नहीं पाते। उनके कर्म केवल फल की आशा से प्रेरित होते हैं, जिससे वे बंधन में पड़ते हैं। उनका ज्ञान भी केवल तर्क और अहंकार पर आधारित होता है, जिससे वे आत्मज्ञान से वंचित रह जाते हैं। वे राक्षसी और आसुरी प्रवृत्तियों की ओर आकर्षित होकर मोह में फँस जाते हैं। यह श्लोक हमें चेतावनी देता है कि केवल बाह्य धार्मिकता पर्याप्त नहीं है — जब तक हम भगवान के वास्तविक स्वरूप को नहीं समझते और आत्मज्ञान की ओर नहीं बढ़ते, तब तक हमारे प्रयास व्यर्थ हैं।
🕊️ शरणागति कैसे हो?
शरणागति का अर्थ है — अपने समस्त कर्मों को ईश्वर को समर्पित करते हुए, निरंतर उनके नाम का ध्यान और जप करना, और जीवन को संयम, ब्रह्मचर्य तथा निष्कामता से जीना।
आप प्रभु के दिव्य नाम "ॐ आनन्दमय ॐ शान्तिमय" का निरंतर, ध्यानपूर्वक जप करें — प्रातः से रात्रि तक, अपने सभी सत्कर्मों के साथ।
यही मानव जीवन का परम उद्देश्य है — इसी जन्म में दिव्यता को प्राप्त करें, यह अमूल्य अवसर न गँवाएँ। 🌺
It's silly how I loved this poem so muchhhh! 🫶
it'sequally silly how im smiling reading your comment🫶🏼
This last line just break me. Is it only meant to one sided, where the other person always act as nonchalant as if they never understood anything ???
ikrr. it's sad when the other one is SO non chalant about ittt:(
You wrote this on my birthday lol
mb, happy belated birthdayay bro<3
Thanks so much dude…
I FELT EVERY LINE THIS IS SO BEAUTIFUL OH MY GOD WOW.
THANKYOUUU<333
this is so damn cutee
very adorable 😭🫶🏼
aww thankyouu🥹🥹
And it’s silly how I’m grinning from ear to ear because i find all this so cutteeeee.
hehe🤭🤍
How beautiful it is 💙
thankyouu!!🤍
I love this frienduatipnship. I am rooting for you guys to be better silly together, as a couple.
This poem is so wholesome and warming. Almost gives me butterflies in my stomach and reminds me of my school love.
Amazing!! 👏
FRIENDUATIONSHIP. omg geniussss
so glad you liked it+ rooting for us to be silly together aaahhh thankyouu🥹 (ts is not happening anytime soon)
*frienduationship (and yes, I made that word up).
That is the silliest thing I've read ;)
But love cannot be all logical. It's real, and I loved it!
real real🗣
thankyouuu<333
Dear Sister I have a gift of God for your supreme welfare:
क्या आप जानते हैं कि भगवान स्वयं किन लोगों को मायावी राक्षस कहते हैं?
श्लोक : 9.12:
*मोगाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥*
संक्षेप :
जो लोग भगवान के दिव्य स्वरूप को नहीं पहचानते, वे भ्रमित रहते हैं। उनकी आशाएँ व्यर्थ होती हैं, कर्म निष्फल हो जाते हैं, और ज्ञान भी निरर्थक हो जाता है। वे आसुरी और राक्षसी प्रवृत्तियों की मोहिनी प्रकृति में फँसे रहते हैं।
व्याख्या :
इस श्लोक में भगवान उन लोगों की स्थिति बताते हैं जो आध्यात्मिक सत्य से विमुख हैं। ऐसे लोग धर्म के बाह्य रूपों में उलझे रहते हैं, परंतु भगवान के सच्चे स्वरूप को नहीं समझते। उनकी आशाएँ केवल सांसारिक सुखों तक सीमित होती हैं, इसलिए वे कभी संतोष नहीं पाते। उनके कर्म केवल फल की आशा से प्रेरित होते हैं, जिससे वे बंधन में पड़ते हैं। उनका ज्ञान भी केवल तर्क और अहंकार पर आधारित होता है, जिससे वे आत्मज्ञान से वंचित रह जाते हैं। वे राक्षसी और आसुरी प्रवृत्तियों की ओर आकर्षित होकर मोह में फँस जाते हैं। यह श्लोक हमें चेतावनी देता है कि केवल बाह्य धार्मिकता पर्याप्त नहीं है — जब तक हम भगवान के वास्तविक स्वरूप को नहीं समझते और आत्मज्ञान की ओर नहीं बढ़ते, तब तक हमारे प्रयास व्यर्थ हैं।
🕊️ शरणागति कैसे हो?
शरणागति का अर्थ है — अपने समस्त कर्मों को ईश्वर को समर्पित करते हुए, निरंतर उनके नाम का ध्यान और जप करना, और जीवन को संयम, ब्रह्मचर्य तथा निष्कामता से जीना।
आप प्रभु के दिव्य नाम "ॐ आनन्दमय ॐ शान्तिमय" का निरंतर, ध्यानपूर्वक जप करें — प्रातः से रात्रि तक, अपने सभी सत्कर्मों के साथ।
यही मानव जीवन का परम उद्देश्य है — इसी जन्म में दिव्यता को प्राप्त करें, यह अमूल्य अवसर न गँवाएँ। 🌺
how so very beautiful<33
thankyou sm🥹<3
the love of my dreams!
this is really well written, nidhi! very thought invoking, and poignant! loved it!!
thankyouu dev!! <3
but i love this.
please write more babes.
i will, for you<3
love language.
trauma-inducing.
babes😭😭
🥹🥹😭😭
khair.